भारत में इलेक्ट्रिक वाहन अब केवल प्रदूषण कम करने का माध्यम नहीं रह गए हैं। खासकर इलेक्ट्रिक दोपहिया और तीन पहिया वाहन—ई-रिक्शा सहित—बड़ी संख्या में लोगों के लिए रोजगार और स्वरोजगार का साधन बन रहे हैं।
जहां एक तरफ इलेक्ट्रिक स्कूटर और बाइक ने डिलीवरी, छोटे कारोबार और व्यक्तिगत परिवहन को आसान बनाया है, वहीं दूसरी तरफ ई-रिक्शा ने शहरों और कस्बों में हजारों लोगों को अपनी रोजी-रोटी चलाने का अवसर दिया है।
सरकार भी समय से ई-रिक्शा को गरीब और कम आय वाले लोगों के लिए रोजगार का साधन मानती रही है. 2014 में नितिन गडकरी ने कहा कि यह गरीबों के लिए मददगार है और रोजगार का माध्यम बन सकता है.
कम पूंजी में रोजगार का रास्ता

भारत में हर व्यक्ति के लिए कॉरपोरेट नौकरी या सरकारी नौकरी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इलेक्ट्रिक वाहन खासकर ई-रिक्शा और ई-ऑटो कई लोगों के लिए कमाई का वैकल्पिक रास्ता बन रहे हैं।
जिस व्यक्ति के पास खुद का ई-रिक्शा खरीदने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है, वह कई जगहों पर वाहन किराये पर लेकर भी काम शुरू कर सकता है।
उदाहरण के तौर पर, किसी शहर में यदि कोई चालक ई-रिक्शा ₹300 से ₹500 प्रतिदिन के किराये पर लेता है और दिनभर काम करके अपनी परिचालन लागत तथा किराया निकालने के बाद ₹500 से ₹1,000 तक बचा लेता है, तो उसके लिए यह रोजगार का एक महत्वपूर्ण साधन बन सकता है।
हालांकि वास्तविक कमाई शहर, रूट, यात्रियों की संख्या, काम के घंटे, किराये, बैटरी और वाहन के रखरखाव जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है।
परिवार की आय में भी हो सकता है बड़ा योगदान

ई-रिक्शा की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है कि यह केवल व्यक्ति की आय का साधन नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में भी भूमिका निभा सकता है।
मान लीजिए किसी परिवार के चार सदस्य अलग-अलग काम करते हैं और उनमें से दो या तीन सदस्य इलेक्ट्रिक दोपहिया, डिलीवरी, ई-रिक्शा या दूसरे छोटे परिवहन कार्यों से आय अर्जित करते हैं। ऐसी स्थिति में परिवार की कुल मासिक आय कई गुना बढ़ सकती है।
इसी वजह से कुछ लोगों के लिए नौकरी के बजाय अपना समय खुद तय करके वाहन चलाना आकर्षक विकल्प बन रहा है।
ई-रिक्शा चलाने वाले लोगों के बीच “अपना काम, अपना समय और अपनी कमाई” जैसी भावना भी देखने को मिलती है। MNRE की एक प्रकाशित सफलता-कहानी में ई-रिक्शा चालक रेशमा ने समय की flexibility और खुद अपना boss होने को इस काम का प्रमुख लाभ बताया है।
कॉरपोरेट नौकरी छोड़कर ई-रिक्शा क्यों?

यह बात हर व्यक्ति पर लागू नहीं होती, लेकिन बदलते रोजगार बाजार में कुछ लोग नौकरी की निश्चित आय के बजाय स्वरोजगार को प्राथमिकता दे रहे हैं।
इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—
- काम के समय में अधिक स्वतंत्रता
- नौकरी के लिए रोजाना लंबी दूरी तय करने की जरूरत नहीं
- कमाई सीधे अपने काम से जुड़ी होना
- अतिरिक्त समय में ज्यादा काम करने की संभावना
- परिवार के किसी दूसरे सदस्य को भी रोजगार से जोड़ने का अवसर
- शहर और कस्बों में लगातार बढ़ती last-mile transport की जरूरत
इसी कारण इलेक्ट्रिक तीन पहिया वाहन केवल परिवहन का साधन नहीं बल्कि micro-entrepreneurship का माध्यम भी बनते जा रहे हैं।
इलेक्ट्रिक दोपहिया भी बन रहे हैं कमाई का जरिया

इलेक्ट्रिक वाहनों की कहानी केवल ई-रिक्शा तक सीमित नहीं है।
इलेक्ट्रिक स्कूटर और बाइक का इस्तेमाल delivery, छोटे व्यापार, स्थानीय आवागमन और दूसरे कामों में किया जा रहा है। पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा लागत कम होने की संभावना और रखरखाव की अलग लागत संरचना के कारण कुछ उपयोगकर्ताओं के लिए इलेक्ट्रिक दोपहिया आर्थिक रूप से उपयोगी साबित हो सकते हैं।
सरकारी आंकड़ों में भी इलेक्ट्रिक दोपहिया और इलेक्ट्रिक तीन पहिया वाहनों की बड़ी संख्या दिखाई देती है। 31 जनवरी 2026 तक PM E-DRIVE के तहत प्रोत्साहित वाहनों में 14,31,133 इलेक्ट्रिक दोपहिया और 2,21,600 L5 इलेक्ट्रिक तीन पहिया वाहन शामिल थे।
लेकिन हर चीज के साथ चुनौतियां भी आती हैं
ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या जहां रोजगार पैदा कर रही है, वहीं इसके साथ कई समस्याएं भी सामने आ रही हैं।
अगर किसी शहर में बिना उचित योजना के बहुत ज्यादा ई-रिक्शा सड़कों पर आ जाएं तो—
- ट्रैफिक की समस्या बढ़ सकती है
- मुख्य सड़कों पर धीमी गति वाले वाहनों से जाम लग सकता है
- गलत जगह पार्किंग की समस्या हो सकती है
- यातायात नियमों का उल्लंघन बढ़ सकता है
- बिना लाइसेंस या बिना उचित दस्तावेजों के वाहन चलने का खतरा हो सकता है
- यात्रियों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है
- घटिया गुणवत्ता वाले वाहनों और बैटरियों से सुरक्षा संबंधी जोखिम पैदा हो सकते हैं
2026 में एक सरकारी समिति ने लगभग 4.75 लाख अनरजिस्टर्ड ई-रिक्शा के बिना certification, registration या insurance संचालित होने की बात दर्ज की और राज्यों तथा संबंधित एजेंसियों द्वारा coordinated enforcement की जरूरत बताई।
इसलिए केवल ई-रिक्शा की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ registration, insurance, fitness, driver training और traffic management भी जरूरी है।
सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
इलेक्ट्रिक वाहन पर्यावरण के लिए लाभकारी हो सकते हैं, लेकिन वाहन की गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा।
हाल ही में सरकार ने ई-रिक्शा के कुछ कम लागत वाले Battery Management System में cyber-security vulnerability से संबंधित समस्या की जानकारी भी दी। CERT-In के अनुसार कुछ मामलों में Bluetooth के जरिए अनधिकृत व्यक्ति चलते ई-रिक्शा की battery को बंद कर सकता था।
इससे यह साफ है कि भविष्य में इलेक्ट्रिक वाहनों की सुरक्षा केवल ब्रेक, टायर और बैटरी तक सीमित नहीं रहेगी। Cyber security भी vehicle safety का हिस्सा बनती जा रही है।
अच्छे ड्राइवरों को मिलना चाहिए प्रोत्साहन

यहीं पर एक महत्वपूर्ण विचार सामने आता है—अगर कोई चालक लगातार सुरक्षित तरीके से वाहन चलाता है, ट्रैफिक नियमों का पालन करता है और उसका driving record अच्छा रहता है, तो उसे केवल दंड देने के बजाय reward भी दिया जाना चाहिए।
नितिन गडकरी ने हाल में ड्राइविंग रिकॉर्ड से जुड़े एक संभावित points-based system की बात की है, जिसमें यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई के साथ अच्छे ड्राइविंग रिकॉर्ड वाले लोगों को incentives देने की संभावना बताई गई है। रिपोर्टों के अनुसार इसमें insurance companies की ओर से मिलने वाले लाभ भी शामिल हो सकते हैं।
ऐसी व्यवस्था में भविष्य में यह संभव हो सकता है कि—
अच्छी ड्राइविंग = बेहतर रिकॉर्ड = कम जोखिम = बीमा में संभावित लाभ
हालांकि इस तरह के प्रस्ताव के वास्तविक नियम, eligibility और insurance benefit की अंतिम व्यवस्था अलग से तय की जानी होगी।
दिलचस्प बात यह है कि भारत में insurance के क्षेत्र में claim-free policyholders को No Claim Bonus के जरिए reward करने की व्यवस्था पहले से मौजूद है।
इसके अलावा 2022 के नियमों के तहत electric और hybrid electric vehicles के third-party insurance premium पर क्रमशः लगभग 15% और 7.5% की छूट का प्रावधान भी किया गया था।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
भारत में चुनौती इलेक्ट्रिक वाहनों को रोकना नहीं, बल्कि उनके विकास को व्यवस्थित करना है।
सरकार को एक ऐसा मॉडल तैयार करना होगा जिसमें—
रोजगार भी बढ़े,
प्रदूषण भी कम हो,
सड़कें भी सुरक्षित रहें,
और यातायात व्यवस्था भी प्रभावित न हो।
इसके लिए शहरों में ई-रिक्शा के लिए निर्धारित stand, route management, driver training, registration और insurance compliance जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत किया जा सकता है।
साथ ही, अच्छी driving करने वाले चालकों को digital driving record के आधार पर incentives देने की व्यवस्था भी भविष्य में एक उपयोगी नीति का हिस्सा बन सकती है।
कितनी उम्र में ई-रिक्शा चला सकते हैं?
यह सवाल भी बहुत महत्वपूर्ण है।
कानून में सामान्य motor vehicle driving के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष है, जबकि कुछ विशेष श्रेणियों के लिए अलग प्रावधान हैं। ई-रिक्शा के संबंध में Motor Vehicles Act में learner’s licence की सामान्य transport-vehicle शर्त से अलग प्रावधान किया गया है। इसलिए किसी व्यक्ति को ई-रिक्शा चलाने से पहले अपने राज्य के परिवहन विभाग के मौजूदा licence, permit और registration नियमों की जांच करनी चाहिए।
ई-रिक्शा भी बिना नियमों के चलाया जाने वाला सामान्य वाहन नहीं है। इसके लिए driving licence, permit, registration, insurance और वाहन से संबंधित लागू requirements का पालन करना आवश्यक है।
इलेक्ट्रिक वाहन सिर्फ वाहन नहीं, रोजगार का माध्यम भी हैं
भारत में इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति को केवल पेट्रोल और डीजल के विकल्प के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।
इसके पीछे रोजगार की एक बड़ी कहानी भी है।
एक तरफ इलेक्ट्रिक दोपहिया delivery और छोटे कारोबार करने वाले लोगों के लिए उपयोगी हो सकते हैं, तो दूसरी तरफ ई-रिक्शा और इलेक्ट्रिक तीन पहिया वाहन कम आय वाले लोगों के लिए स्वरोजगार का माध्यम बन रहे हैं।
लेकिन इस बदलाव को सफल बनाने के लिए केवल वाहनों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है।
सुरक्षित वाहन, प्रशिक्षित चालक, सही registration, insurance, बेहतर traffic management और अच्छे ड्राइविंग व्यवहार को reward करने वाली व्यवस्था—इन सभी को साथ लेकर चलना होगा।
तभी इलेक्ट्रिक वाहन भारत में केवल “Green Transport” नहीं बल्कि “Green Transport + रोजगार” का मजबूत मॉडल बन पाएंगे।
